🛕 श्रीमद्‍भगवद्‍ गीता 🛕

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 2 | Bhagavad Gita Chapter 14 Shlok 2

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 2

Bhagavad Gita Adhyay 14 Shlok 2 में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि इस दिव्य ज्ञान को ग्रहण करके मनुष्य भगवान की समान दिव्य प्रकृति को प्राप्त कर लेता है और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसे ज्ञानी न तो सृष्टि के समय जन्म लेते हैं और न ही प्रलय के समय विचलित होते हैं।
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श्लोक:
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥२॥

Transliteration:
idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ
sarge ’pi nopajāyante pralaye na vyathanti cha

अर्थ:

इस ज्ञान में स्थिर होकर मनुष्य मेरी जैसी दिव्य प्रकृति (स्वभाव) को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार स्थित हो जाने पर वह न तो सृष्टि के समय उत्पन्न होता है और न प्रलय के समय विचलित होता है।

Meaning:
By taking refuge in this knowledge, men attain to My divine nature. Being thus situated, they are neither born at the time of creation nor disturbed at the time of dissolution.

तात्पर्य:

पूर्ण दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य भगवान से गुणात्मक समता प्राप्त कर लेता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। लेकिन जीवात्मा के रूप में उसका वह स्वरूप समाप्त नहीं होता। वैदिक ग्रंथों से ज्ञात होता है कि जो मुक्तात्माएँ वैकुण्ठ लोक में पहुँच चुकी हैं, वे निरंतर भगवान के चरणकमलों के दर्शन करती हुई, उनकी दिव्य प्रेमाभक्ति में लीन रहती हैं। अतः मुक्ति के बाद भी भक्तों का अपना व्यक्तिगत स्वरूप समाप्त नहीं होता।
सामान्यतया इस संसार में जो भी ज्ञान हम प्राप्त करते हैं, वह प्रकृति के तीन गुणों से दूषित रहता है। लेकिन जो ज्ञान इन गुणों से परे है, वही दिव्य ज्ञान कहलाता है। जब कोई व्यक्ति इस दिव्य ज्ञान को प्राप्त करता है, तो वह परमपुरुष के समकक्ष पद प्राप्त कर लेता है।
जिन लोगों को आध्यात्मिक जगत का ज्ञान नहीं है, वे सोचते हैं कि भौतिक स्वरूप के कार्यकलापों से मुक्त होने पर आत्मा की पहचान निराकार हो जाती है और उसमें कोई विविधता नहीं रहती। किंतु वास्तविकता यह है कि आध्यात्मिक जगत में भी विविधता है। वहाँ आत्मा को आध्यात्मिक रूप प्राप्त होता है और सभी कार्यकलाप शुद्ध आध्यात्मिक होते हैं। यही स्थिति भक्तिमय जीवन कहलाती है।
इस वातावरण में व्यक्ति परमेश्वर के समकक्ष गुणों वाला हो जाता है, लेकिन वह स्वयं परमेश्वर नहीं बनता। ऐसा ज्ञान प्राप्त करने के लिए मनुष्य को आध्यात्मिक गुणों का विकास करना होता है। जब वह ऐसा कर लेता है, तब भौतिक जगत की सृष्टि और प्रलय, दोनों से ही अप्रभावित रहता है।

When one firmly takes shelter of this transcendental knowledge, he attains divine nature like the Lord. Such liberated souls are no longer subject to the cycle of birth and death. However, their individuality as eternal souls is never lost. The Vedic scriptures reveal that those who have attained liberation in Vaikuntha eternally behold the lotus feet of the Lord and remain engaged in His loving devotional service.
Knowledge in the material world is generally contaminated by the three modes of nature, but when one acquires pure transcendental knowledge, he rises above these modes. In that state, one is situated in spiritual existence, in qualitative equality with the Lord.
Those unfamiliar with the spiritual realm may think liberation means merging into a formless state devoid of variety. But this is a misconception. Just as there is variety in this material world, there is also variety in the spiritual world. In the spiritual sky, the soul receives a spiritual body, and all activities are transcendental. This condition is pure devotional life.
In such a state, one is not affected by creation or dissolution of the material world. Attaining this transcendental knowledge thus ensures freedom from all material influences and establishes one in eternal devotional service to the Lord.

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