🛕 श्रीमद्‍भगवद्‍ गीता 🛕

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 27 | Bhagavad Gita Chapter 14 Shlok 27

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 27

Bhagavad Gita Adhyay 14 Shlok 27 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही उस निराकार ब्रह्म के आधार हैं, जो अमर, अविनाशी, शाश्वत और परम सुख का धाम है।
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श्लोक:
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥२७॥

Transliteration:
brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya cha
śhāśhvatasya cha dharmasya sukhasyaikāntikasya cha

अर्थ:

और मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आश्रय हूँ, जो अमर्त्य, अविनाशी तथा शाश्वत है और चरम सुख का स्वाभाविक पद है।

Meaning:
I am the basis of the impersonal Brahman, which is immortal, imperishable, and eternal, and is the constitutional position of ultimate happiness.

तात्पर्य:

ब्रह्म का स्वरूप है अमरता, अविनाशिता, शाश्वतता तथा सुख। ब्रह्म तो दिव्य साक्षात्कार का शुभारम्भ है। परमात्मा इस दिव्य साक्षात्कार की मध्य या द्वितीय अवस्था है और भगवान् परम सत्य के चरम साक्षात्कार हैं। अतएव परमात्मा तथा निराकार ब्रह्म दोनों ही परम पुरुष के भीतर रहते हैं।
सातवें अध्याय में बताया जा चुका है कि प्रकृति परमेश्वर की अपरा शक्ति की अभिव्यक्ति है। भगवान् इस अपरा प्रकृति में परा प्रकृति को गर्भस्थ करते हैं और भौतिक प्रकृति के लिए यह आध्यात्मिक स्पर्श है। जब इस प्रकृति द्वारा बद्धजीव आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन करना प्रारम्भ करता है, तो वह इस भौतिक जगत् के पद से ऊपर उठने लगता है और क्रमशः परमेश्वर के ब्रह्म-बोध तक उठ जाता है।
ब्रह्मबोध की प्राप्ति आत्म-साक्षात्कार की दिशा में प्रथम अवस्था है। इस अवस्था में ब्रह्मभूत व्यक्ति भौतिक पद को पार कर जाता है, लेकिन वह ब्रह्म-साक्षात्कार में पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता। यदि वह चाहे तो इस ब्रह्मपद पर बना रह सकता है और धीरे-धीरे परमात्मा के साक्षात्कार को और फिर भगवान् के साक्षात्कार को प्राप्त हो सकता है।
वैदिक साहित्य में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। चारों कुमार पहले निराकार ब्रह्म में स्थित थे, लेकिन क्रमशः वे भक्तिपद तक उठ गए। जो व्यक्ति निराकार ब्रह्मपद से ऊपर नहीं उठ पाता, उसके नीचे गिरने का डर बना रहता है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि भले ही कोई निराकार ब्रह्म की अवस्था को प्राप्त कर ले, किन्तु इससे ऊपर उठे बिना तथा परम पुरुष के विषय में सूचना प्राप्त किये बिना उसकी बुद्धि विमल नहीं हो पाती। अतएव ब्रह्मपद तक उठ जाने के बाद भी यदि भगवान् की भक्ति नहीं की जाती, तो नीचे गिरने का भय बना रहता है।
वैदिक भाषा में यह भी कहा गया है - रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति – रस के आगार भगवान् श्रीकृष्ण को जान लेने पर मनुष्य वास्तव में दिव्य आनन्दमय हो जाता है (तैत्तिरीय उपनिषद् २.७.१)।
परमेश्वर छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं और जब भक्त निकट पहुँचता है तो इन छह ऐश्वर्यों का आदान-प्रदान होता है। राजा का सेवक लगभग राजा के ही समान पद का भोग करता है। इस प्रकार के शाश्वत सुख, अविनाशी सुख तथा शाश्वत जीवन भक्ति के साथ-साथ चलते हैं। अतएव भक्ति में ब्रह्म-साक्षात्कार या शाश्वतता या अमरता सम्मिलित रहते हैं। भक्ति में प्रवृत्त व्यक्ति में ये पहले से ही प्राप्त रहते हैं।

The nature of Brahman is immortality, imperishability, eternity, and bliss. Brahman realization is the beginning of spiritual awareness. Paramatma realization is the intermediate stage, and realization of Bhagavan, the Supreme Personality, is the ultimate stage. Thus, both the impersonal Brahman and the localized Paramatma exist within the Supreme Person.
As described earlier in Chapter 7, material nature is an expression of the Lord’s inferior energy. When the superior energy is infused into it, life in the material world begins. When the conditioned soul practices spiritual knowledge, he rises above the material platform and gradually attains Brahman realization.
Realizing Brahman is the first step in self-realization, where one transcends the bodily concept of life. But this realization is incomplete. One may remain in Brahman realization, or progress further to Paramatma realization and finally to Bhagavan realization.
The scriptures provide many examples. The four Kumaras were once situated in Brahman realization but later advanced to the stage of devotional service. Without progressing beyond Brahman realization, there is always the danger of falling down. The Srimad Bhagavatam states that even if one attains Brahman realization, unless one gains knowledge of the Supreme Person, one cannot achieve purity of intelligence.
Therefore, without devotion to the Lord, even Brahman realization is insecure. The Taittiriya Upanishad states: raso vai saḥ, rasan hy evāyaṁ labdhvā nandī bhavati by realizing Krishna, the reservoir of all rasas, one becomes truly blissful.
The Lord is full of six opulences, and when the devotee comes close, he shares in these opulences. Just as a king’s servant enjoys the same comforts as the king, the devotee enjoys eternal life, imperishable joy, and everlasting bliss in devotional service. Hence, devotion inherently includes Brahman realization, immortality, and eternity.

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