Bhagavad Gita Adhyay 14 Shlok 9 में श्रीकृष्ण ने बताया है कि सतोगुण मनुष्य को सुख से बाँधता है, रजोगुण सकाम कर्म से बाँधता है और तमोगुण ज्ञान को ढककर मनुष्य को प्रमाद तथा पागलपन में बाँधता है।
श्लोक:
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥९॥
Transliteration:
sattvaṁ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata
jñānam āvṛitya tu tamaḥ pramāde sañjayaty uta
हे भरतपुत्र! सतोगुण मनुष्य को सुख से बाँधता है, रजोगुण सकाम कर्म से बाँधता है और तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढक कर उसे पागलपन से बाँधता है।
Meaning:
O son of Bharata, goodness binds one to happiness, passion binds one to fruitive actions, and ignorance, covering knowledge, binds one to madness.
सतोगुणी पुरुष अपने कर्म या बौद्धिक वृत्ति से उसी तरह सन्तुष्ट रहता है, जिस प्रकार दार्शनिक, वैज्ञानिक या शिक्षक अपनी-अपनी विद्याओं में निरत रहकर सन्तुष्ट रहते हैं। रजोगुणी व्यक्ति सकाम कर्म में लगा रहता है। वह यथासम्भव धन प्राप्त करता है और उसे कभी-कभी उत्तम कार्यों में व्यय करता है। वह अस्पताल खोल सकता है, धर्मार्थ संस्थाओं को दान दे सकता है। ये लक्षण हैं रजोगुणी व्यक्ति के।
किन्तु तमोगुण तो ज्ञान को ढक लेता है। तमोगुण में रहकर मनुष्य जो भी करता है, वह न तो उसके लिए हितकर होता है और न ही दूसरों के लिए। यही तमोगुण की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह जीवन की प्रगति में बाधक बन जाता है।
A person in the mode of goodness becomes satisfied in his intellectual pursuits or occupation, like a philosopher, scientist, or teacher, finding happiness in such engagement. A person influenced by passion becomes attached to fruitive work, striving to earn as much wealth as possible and sometimes spending it for charitable purposes, such as opening hospitals or donating to institutions. These are the symptoms of passion.
Ignorance, however, covers real knowledge. A person influenced by tamas engages in activities that are neither beneficial to himself nor to others. Such work leads only to degradation and delusion.
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