🛕 श्रीमद्‍भगवद्‍ गीता 🛕

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 10 | Bhagavad Gita Chapter 14 Shlok 10

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 10

Bhagavad Gita Adhyay 14 Shlok 10 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तीनों गुण - सत्त्व, रजस और तमस - आपस में प्रधानता के लिए संघर्ष करते रहते हैं। कभी सतोगुण प्रभावी होता है, कभी रजोगुण और कभी तमोगुण, और यही संघर्ष जीवन में निरंतर चलता है।
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श्लोक:
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१०॥

Transliteration:
rajas tamaśh chābhibhūya sattvaṁ bhavati bhārata
rajaḥ sattvaṁ tamaśh chaiva tamaḥ sattvaṁ rajas tathā

अर्थ:

हे भरतपुत्र! कभी-कभी सतोगुण रजोगुण तथा तमोगुण को परास्त करके प्रधान बन जाता है, तो कभी रजोगुण सतोगुण और तमोगुण को परास्त कर देता है, और कभी तमोगुण सतोगुण तथा रजोगुण को परास्त कर देता है। इस प्रकार श्रेष्ठता के लिए निरंतर स्पर्धा चलती रहती है।

Meaning:
O son of Bharata, sometimes the mode of goodness prevails over passion and ignorance, at other times passion suppresses goodness and ignorance, and at other times ignorance dominates goodness and passion. In this way, there is always a constant struggle for supremacy among the three modes of nature.

तात्पर्य:

जब रजोगुण प्रधान होता है, तो सतोगुण तथा तमोगुण परास्त रहते हैं। जब सतोगुण प्रधान होता है, तो रजोगुण और तमोगुण परास्त हो जाते हैं। जब तमोगुण प्रधान होता है, तो रजोगुण और सतोगुण परास्त हो जाते हैं। यह प्रतियोगिता निरंतर चलती रहती है।
अतएव जो कृष्णभावनामृत में वास्तव में उन्नति करने का इच्छुक है, उसे इन तीनों गुणों को लाँघना पड़ता है। प्रकृति के किसी एक गुण की प्रधानता मनुष्य के आचरण, उसके कार्यकलापों और उसके खान-पान में प्रकट होती है। इन सबकी व्याख्या अगले अध्यायों में की जाएगी।
लेकिन यदि कोई चाहे तो वह अभ्यास द्वारा सतोगुण को विकसित कर सकता है और इस प्रकार रजोगुण तथा तमोगुण को परास्त कर सकता है। इसी प्रकार कोई चाहे तो रजोगुण विकसित कर सकता है और तमोगुण तथा सतोगुण पर विजय पा सकता है। अथवा कोई तमोगुण को विकसित करके रजोगुण और सतोगुण को परास्त कर सकता है।
यद्यपि प्रकृति के ये तीन गुण होते हैं, किन्तु यदि कोई संकल्प कर ले तो उसे सतोगुण का आशीर्वाद मिल सकता है और वह इसे लाँघकर शुद्ध सतोगुण में स्थित हो सकता है, जिसे वासुदेव अवस्था कहते हैं। इसी अवस्था में वह ईश्वर के विज्ञान को समझ सकता है।
विशिष्ट कार्यों और व्यवहार को देखकर ही समझा जा सकता है कि कौन व्यक्ति किस गुण में स्थित है।

When passion prevails, goodness and ignorance are suppressed. When goodness is dominant, passion and ignorance are subdued. When ignorance is in control, passion and goodness are overpowered. Thus, there is an ongoing competition among the three modes of nature.
One who sincerely desires to progress in Krishna consciousness must transcend all three modes. The dominance of a particular mode is reflected in one’s behavior, activities, and even eating habits. By practice, one may develop goodness and thereby overcome passion and ignorance; or one may develop passion to dominate goodness and ignorance; or cultivate ignorance to overpower passion and goodness.
Although these three modes exist, by determination one can receive the blessings of goodness and eventually rise above it to the pure state of goodness, called the Vasudeva state, where one can truly understand the science of God.
From observing a person’s actions, one can determine which mode of nature he is situated in.

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