🛕 श्रीमद्‍भगवद्‍ गीता 🛕

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 11 | Bhagavad Gita Chapter 14 Shlok 11

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 11

Bhagavad Gita Adhyay 14 Shlok 11 में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि सतोगुण की पहचान तब होती है जब शरीर के सभी द्वार ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो जाते हैं। यह स्थिति मनुष्य के आंतरिक और बाहरी जीवन को शुद्ध करती है और सत्य को देखने, सुनने और अनुभव करने की क्षमता को बढ़ाती है।
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श्लोक:
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥११॥

Transliteration:
sarva-dvāreṣhu dehe ’smin prakāśha upajāyate
jñānaṁ yadā tadā vidyād vivṛiddhaṁ sattvam ity uta

अर्थ:

सतोगुण की अभिव्यक्ति को तभी अनुभव किया जा सकता है, जब शरीर के सारे द्वार ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं।

Meaning:
When the light of knowledge illuminates all the doors of the body, one should understand that the mode of goodness has increased.

तात्पर्य:

शरीर में नौ द्वार हैं - दो आँखें, दो कान, दो नथुने, मुँह, गुदा तथा उपस्थ।
जब प्रत्येक द्वार सत्त्व के लक्षण से दीपित हो जायें, तो समझना चाहिए कि उसमें सतोगुण विकसित हो चुका है।
सतोगुण में सारी वस्तुएँ अपनी सही स्थिति में दिखती हैं, सही-सही सुनाई पड़ता है और सही ढंग से उन वस्तुओं का स्वाद मिलता है।
मनुष्य का अन्तः तथा बाह्य शुद्ध हो जाता है।
प्रत्येक द्वार में सुख के लक्षण उत्पन्न दिखते हैं और यही स्थिति होती है सत्त्वगुण की।

The body has nine gates two eyes, two ears, two nostrils, the mouth, the anus, and the genitals. When all these gates are illuminated by the qualities of goodness, it should be understood that sattva (the mode of goodness) has developed.
In this state, one sees things as they are, hears properly, and tastes correctly. Both the internal and external life of a person becomes purified. Happiness manifests through every gate of the body, and this condition is the true sign of the predominance of sattva guna.

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