🛕 श्रीमद्‍भगवद्‍ गीता 🛕

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 18 | Bhagavad Gita Chapter 14 Shlok 18

भगवद गीता अध्याय 14 श्लोक 18

Bhagavad Gita Adhyay 14 Shlok 18 में बताया गया है कि सतोगुणी लोग उच्च लोकों की ओर जाते हैं, रजोगुणी इस पृथ्वीलोक पर ही रहते हैं, और जो लोग तमोगुण में अत्यधिक लिप्त रहते हैं, वे नीचे अधोलोक या नरक लोकों को प्राप्त होते हैं।
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श्लोक:
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१८॥

Transliteration:
ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥ
jaghanya-guṇa-vṛitti-sthā adho gachchhanti tāmasāḥ

अर्थ:

सतोगुणी व्यक्ति क्रमशः ऊपर उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुणी इसी पृथ्वीलोक में रह जाते हैं और जो अत्यन्त गर्हित तमोगुण में स्थित हैं, वे नीचे नरक लोकों को जाते हैं।

Meaning:
Those situated in the mode of goodness gradually go upward to higher planets; those in the mode of passion remain on the earthly plane; and those in the mode of ignorance, acting in a most abominable way, go down to the hellish worlds.

तात्पर्य:

इस श्लोक में तीनों गुणों के कर्मों के फल को स्पष्ट रूप से बताया गया है। ऊपर के लोकों या स्वर्गलोकों में प्रत्येक व्यक्ति अत्यन्त उन्नत होता है। जीवों में जितना सतोगुण विकसित होता है, उसी के अनुसार उसे विभिन्न स्वर्गलोकों में भेजा जाता है। सर्वोच्च लोक सत्यलोक या ब्रह्मलोक है, जहाँ इस ब्रह्माण्ड के प्रधान व्यक्ति ब्रह्माजी निवास करते हैं। ब्रह्मलोक की अद्भुत स्थिति का अनुमान करना कठिन है, परंतु सतोगुण की सर्वोच्च अवस्था हमें वहाँ तक पहुँचा सकती है।
रजोगुण मिश्रित गुण है, जो सत्त्व और तमोगुण के बीच स्थित है। मनुष्य सदैव शुद्ध नहीं होता, लेकिन यदि वह पूर्णतया रजोगुणी हो तो इस पृथ्वी पर राजा या धनी व्यक्ति के रूप में रहता है। परंतु गुणों के मिश्रण के कारण वह नीचे भी जा सकता है। पृथ्वी पर रजो या तमोगुणी लोग बलपूर्वक किसी साधन से उच्चतर लोकों में नहीं पहुँच सकते। रजोगुण में यह भी सम्भावना रहती है कि अगले जन्म में कोई प्रमत्त हो जाए।
तमोगुण को यहाँ जघन्य कहा गया है, जिसका अर्थ है अत्यन्त गर्हित। अज्ञानता का विकास (तमोगुण) भयंकर परिणाम देता है। यह प्रकृति का निम्नतम गुण है। मनुष्य योनि से नीचे ८० लाख योनियाँ (पक्षी, पशु, सरीसृप, वृक्ष आदि) हैं और तमोगुण के अनुसार जीव इन अधम योनियों में जन्म लेता है। यहाँ प्रयुक्त तामसाः शब्द विशेष है, जो उन लोगों को सूचित करता है जो ऊपर उठने का प्रयास न करके निरन्तर अज्ञान में ही रहते हैं। उनका भविष्य अंधकारमय होता है।
तमोगुणी और रजोगुणी लोगों के लिए सतोगुणी बनने का अवसर है, और यह अवसर कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया से मिलता है। लेकिन जो इस अवसर का लाभ नहीं उठाता, वह निम्नतर गुणों में ही बना रहता है।

This verse clearly explains the results of actions performed under the three modes of nature. Those in the mode of goodness rise to higher planets such as Satyaloka (Brahmaloka), the abode of Lord Brahma. The more one develops goodness, the higher he is elevated.
The mode of passion is mixed, situated between goodness and ignorance. A person dominated by passion may live on earth as a king or wealthy man but may also degrade, depending on the mixture of modes. Those in passion cannot forcibly reach higher planets; at best, they remain in the earthly realm.
The mode of ignorance is described as abominable (jaghanya). Advancement in ignorance leads to degradation into the 8 million lower species such as animals, birds, reptiles, and trees. The word tāmasāḥ is very significant, indicating those who remain perpetually in ignorance without aspiring for higher modes. Their future is dark and hopeless.
However, both the passionate and the ignorant have the chance to elevate themselves to goodness through the process of Krishna consciousness. If they neglect this opportunity, they remain trapped in the lower modes of nature.

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